प्रेगनेंसी में माँ की डायबिटीज का बच्चे पर क्या असर पड़ता है

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गर्भधारण के दौरान और गर्भावस्था में मां की सेहत का असर आने वाले शिशु पर भी पड़ता है।

प्रेगनेंसी के दौरान आपको अपनी और अपने बच्चे, दोनों की सेहत का ध्यान रखना होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही बातों के अनुसार गर्भधारण से पहले, गर्भधारण के दौरान और गर्भावस्था में मां की सेहत का असर आने वाले शिशु पर भी पड़ता है। जो किसी छोटी अवधि या लम्बे समय तक चलने वाली समस्या के रुप में उभर सकते हैं। यही वजह है कि प्रेगनेंसी के दौरान अच्छी आदतें मां के स्वास्थ्य और बच्चों की भलाई के लिए जरूरी है।

वैसे जहां यह धारणा आम है कि प्रेगनेंसी के दौरान शराब या अल्कोहल और धूम्रपान से बच्चे के विकास पर गम्भीर असर पड़ सकता है वहीं कुछ और भी महत्वपूर्ण बातें हैं जिनके बारे में महिलाओं को जानकारी नहीं है। गर्भावधि मधुमेह या जेस्टेशनल डायबिटीज़ (gestational diabetes), हाइपरटेंशन (hypertension) से लेकर मोटापा और एनीमिया (anaemia), जैसी परेशानियां गर्भावस्था के दौरान बच्चे की सेहत पर असर डाल सकती हैं। भारती हॉस्पिटल के कंसल्टेंट एंडोक्राइनोलॉजिस्ट और साउथ एशियन फेडरेशन ऑफ एंडोक्राइन सोसायटीज के वाइस प्रेसिडेंट डॉ. संजय कालरा बता रहे हैं कुछ ऐसी ही समस्याओं के बारे में जो गर्भावस्था के दौरान आपके बच्चे की सेहत पर असर डाल सकती हैं।

जेस्टेशनल डायबिटीज़- तकरीबन 4.9% बच्चों को जेस्टेशनल डायबिटीज़ ( gestational diabetes) की वजह से जन्म के समय गहन देखभाल के लिए नियोनटाल इंटेंसिव केयर (NICU) में रखना पड़ सकता है। जबकि 32.3% को सांस से जुड़ी परेशानियां हो सकती हैं। जिन महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान जेस्टेशनल डायबिटीज़ की समस्या होती है उनके बच्चों में मोटापे, दिल से जुड़ी गड़बड़ियों और टाइप 2 डायबिटीज़ का ख़तरा जीवनभर के लिए होता है।

एनीमिया- गर्भावस्था के दौरान भोजन के माध्यम से प्राप्त होने वाले आयरन, फॉलेट और विटामिन बी12 जैसे आवश्यक तत्वों की कमी के कारण प्रेगनेंट महिला में एनीमिया की सम्भावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। इसी तरह जैव उपलब्धता या बायोअवेलिबिलिटी (bioavailability,भी एक वजह बन सकती है जो प्रेगनेंसी के दौरान आयरन की कमी के कारण उत्पन्न होती है। मेटाबॉलिक गड़बड़ियों की तरह ही मां को एनीमिया की शिकायत गर्भ में पल रहे बच्चे पर बहुत बुरे असर डाल सकती है। एनीमिया से शिकार गर्भवती माताओं में से तकरीबन 6.5% मामलों में बच्चों का जन्म वज़न के वक्त काफी कम होता है, जबकि 11.5% मामलों में लेबर से पहले की परेशानियां देखी गयी हैं। एनीमिया, के चलते मां से भ्रूण को ऑक्सीजन की गर्भनाल या प्लैसेंटल(placental) की तरफ होनेवाली सप्लाई भी कम हो सकती है। जिससे गर्भनाल या प्लैसेंटा (placenta) का विकास धीमा हो जाता है और एंडोक्रॉइन ग्लैंड (endocrine gland) की कार्यप्रणाली में बाधा आती है। इसीलिए भारत में आयरन और ब्लड सेल्स बनाने वाले (hematopoietic) विटामिन की दवाइयों की सलाह दी जाती है, जिनकी मदद से प्रेगनेंसी से पहले और प्रेगनेंसी के दौरान हिमोग्लोबिन का स्तर सामान्य रखने की कोशिश की जाती है।

जेस्टेशनल हाइपरटेंशन- यह समस्या गर्भधारण के 20वें सप्ताह के आसपास उत्पन्न होती है, जो कि चिंता का एक विषय है। जेस्टेशनल हाइपरटेंशन में गर्भनाल की रक्त कोशिकाओं में ऑक्सिजन की कमी हो जाती है और भ्रूण को पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा नहीं मिलती। जेस्टेशनल हाइपरटेंशन के कारण शिशुओं में पायी जाने वाली आम परेशानियों हैं- गर्भाशय में धीमा विकास, जन्म के समय कम वज़न, लो ब्लड शुगर और कमज़ोर मांसपेशियां। कुछ मामलों में बच्चों को किशोरावस्था की शुरुआत में हाइपरटेंशन की समस्या हो सकती है।

माता का अधिक वज़न- गर्भावस्था में मां का वज़न अधिक होने से बच्चे को डायबिटीज़ की समस्या हो सकती है जिसके चलते मां को प्रीटर्म लेबर और बच्चे में मोटापा और डायबिटीज़ का खतरा उत्पन्न होता है। यही नहीं, प्रेगनेंसी के दौरान पोषक तत्वों की मात्रा में थोड़ी-सी कमी के कारण भी बच्चे की सेहत पर गहरा असर पड़ सकता है। जैसे, प्रेगनेंसी के दौरान विटामिन डी की कमी के कारण न केवल बच्चे की हड्डियां कमज़ोर होती हैं बल्कि मां और बच्चे के शारीरिक विकास में भी बाधा आती है।

डॉ. संजय कालरा कहते हैं, “अगर प्रेगनेंसी के दौरान मां को जेस्टेशनल डायबिटीज़ या हाइपरटेंशन की समस्या होती है, तो बच्चे की बचपन में विस्तृत जांच करानी चाहिए। बच्चे के विकास और सम्भावनाओं पर भी ध्यान देना चाहिए, और इसके लिए आप अपनी लाइफस्टाइल में आवश्यक बदलाव कर सकते हैं।”

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