मां मेरे संग-संग

188
silhouette of mother kissing her daughter

मां मेरे संग-संग

मां तस्वीरों में नहीं विराजती, यह बच्चों के साथ जन्म लेती है। बच्चे पढ़ते हैं तो जैसे मां को मिल जाती हैं डिग्रियां। अपनी संतान के लिए हर बाधा से लड़ जाने वाली मां के लिए एक वक्त ऐसा भी आता है, जब उसे जरूरत होती है प्यार और संभाल की। इस नवरात्र करते हैं कुछ ऐसी बेटियों को सलाम, जिन्होंने खुद को किया मां के

लिए समर्पित

रोहतक निवासी दीपशिखा सुहासिनी एक निजी कंपनी में नौकरी करती हैं। तनख्वाह बहुत ज्यादा नहीं है, पर इतनी है कि वह उससे दो घरों की जरूरतें पूरी कर लेती हैं। दो परिवारों की दीपशिखा कहती हैं, ”क्या यह जरूरी है कि शादी के बाद बेटियां मां को सिर्फ तीज-त्योहार पर ही याद करें। अगर यही होता रहेगा तो किसी भी मां का बेटी की पैदाइश पर उदास होना स्वाभाविक है। शुरुआत में जब मैंने अपने ससुराल में अपनी मां के प्रति अपनी जिम्मेदारियों की बात की तो मेरी खूब तारीफ हुई, पर कुछ दिन बाद जैसे वे इस सबसे ‘इरीटेट’ होने लगे। उन्हें लगता था कि सिर्फ मैं ही क्यों और भी तो दो बेटियां हैं, वे क्यों नहीं यह जिम्मेदारी बांटतीं। वक्त लगा उन्हें

समझाने में, पर आज मुझे खुशी है कि मैं अपनी मां को अपने पास रख पा रही हूं। मेरी मां मेरे साथ हैं। मुझे परवाह नहीं कि बाकी बहनें क्या कर रही हैं और क्या नहीं। मैं खुद को सौभाग्यशाली मानती हूं कि मां का आशीर्वाद पाने के लिए मुझे किसी आयोजन का इंतजार नहीं करना पड़ता। वह हर दम मेरे साथ हैं।

मेरी सहेली थीं मां

जम्मू की डॉ. रमा शर्मा नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति में हिंदी अधिकारी हैं। अपनी मां को याद करते हुए वह कहती हैं, ”मेरी मां मेरी सहेली थीं। हममें सिर्फ सोलह साल का फर्क था। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक उम्र के बाद सोलह साल का फर्क कोई मायने नहीं रखता। मुझसे छोटे तीन भाई हैं, लेकिन मैं मां के साथ शुरू से बहुत अटैच रही हूं। सोना, जागना क्या हम लोग तो शॉपिंग, त्योहार और आयोजनों के भी साथी थे।

मैंने कभी सोचा ही नहीं कि मुझे मां को छोड़कर जाना होगा या मां मुझे छोड़कर जाएगी कभी। जब मामाजी बीमार हुए और फिर उनका देहांत हुआ, मां बिल्कुल टूट गई थीं। उस समय मां मुझे अपनी छोटी बहन जैसी लगती थीं। मैं हर समय मां के लिए फिक्रमंद रहती थी। उनके खाने-पीने से लेकर छोटी-बड़ी हर जरूरत के लिए तन-मन-धन से लगी हुई थी, पर मां को नहीं बचा पाई। डेढ़ साल लगातार बिस्तर पर रहने के बाद उनका देहांत हो गया। अब जैसे पूरा घर खाली हो गया है। मेरी सबसे प्यारी सहेली मुझे छोड़कर चली गई है। मेरे दिन-रात उन्हीं से थे।”

सबसे पहले है मां…

”मेरा बिजनेस, मेरा परिवार आज भले ही मेरे लिए जरूरी है, लेकिन पहली प्राथमिकता मेरी मां हंै। जन्म देने और समाज में एक मुकाम तक पहुंचाने के ऋ ण को किसी भी जन्म में उतारा नहीं जा सकता है। हम चारों भाई-बहन हर कदम पर मां का साथ देने के लिए तैयार रहते हैं”, कहती हैं लखनऊ की उद्यमी आस्था अग्रवाल।

वह कहती हैं, ”मेरी शादी वर्ष 2001 में हो गई थी, लेकिन इन पंद्रह सालों में आज तक मैंने मां को कभी महसूस नहीं होने दिया कि वह मुझसे दूर हैं। मां को जब भी हमारी जरूरत होती है, हम सब भाई-बहन हमेशा मां के पास होते हैं। बिजनेस के साथ ही परिवार की जिम्मेदारी भी मुझ पर है। फिर भी मेरी पहली प्राथमिकता मेरी मां हैं, क्योंकि उनसे बढ़कर मेरे लिए कुछ भी नहीं है। मैंने कभी भगवान को तो नहीं देखा, पर मां के रूप में मैंने उन्हें देख लिया है। वर्ष 2009 में मेरी मां को अल्जाइमर हो गया था। कई जगह इलाज करवाया, पर स्थिति में सुधार नहीं हुआ। हाल ही में दैनिक जागरण में अल्जाइमर के बारे में पढ़ा तो मैंने तुरंत उन डॉक्टर से संपर्क किया। डॉक्टर के कथन से कुछ उम्मीद भी जगी है। डॉक्टर ने मां को दिखाने के लिए समय भी दे दिया है। मैं उन्हें नवरात्र शुरू होते ही डॉक्टर के पास ले जाऊंगी, क्योंकि नवरात्र उपवास से ज्यादा जरूरी है अपनी मां का स्वास्थ्य। मुझे उम्मीद है

ये नवरात्र हमारे लिए शुभ होंगे।”

मैं उनकी लाठी वो मेरी ताकत

”बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा तो अब गूंजा है, लेकिन हमारी मां ने हमें 50 साल पहले तब पढ़ाया जब बेटियां होने के बावजूद बेटे को जन्म देना भी एक मां के लिए अनिवार्य था। इसीलिए हम तीन बहनों के बाद हमारे परिवार में भाई आया। बचपन में हम बहनों ने भी एक भाई के लिए दुआएं मांगी थीं, लेकिन तब नहीं पता था कि बड़ा होकर वह न मां का होगा न बहनों का। शादी के बाद वह अपनी दुनिया में मसरूफ है। मां की लंबी बीमारी व आखिरी समय में भी वह पड़ोस में रहकर भी हाल तक पूछने नहीं आया।

हम तीनों बहनों ने मिलकर मां की बीमारी के दौरान उनका साथ निभाया।” यह बताते हुए दीपा की आंखें भीग जाती हैं और गला रुंधने लगता है। मां के अंतिम समय तक दिन-रात उनकी सेवा करने वाली शिमला निवासी दीपा बताती हैं कि बचपन में आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि तीनों बेटियों को पढ़ाना आसान नहीं था, लेकिन मां ने अपनी जिद से हमें पढ़ा-लिखाकर स्वावलंबी बनाया। मां द्वारा पढ़ाये आत्मनिर्भरता के पाठ को मैंने गांठ बांध लिया था। उन्हीं की प्रेरणा से अपने पैरों पर खड़ी हुई थी मैं।

पारिवारिक उतार-चढ़ाव में भी मां ही मेरा सहारा बनीं। हर कठिनाई से लडऩे का भावनात्मक संबल वह बनीं। यही कारण रहा कि लंबी सरकारी नौकरी के बाद कुछ साल पहले मैंने प्रीमेच्योर रिटायरमेंट ली है। मां का साथ था इसीलिए सिंगल पैरेंट के रूप में अपने दोनों बेटों की अच्छी परवरिश कर उन्हें सेटल कर सकी और मां का भी ख्याल रख पायी। लंबी बीमारी के दौरान वो करीब तीन महीने तक अस्पताल में थीं। हम तीनों बहनें और हम तीनों के बच्चे भी तीमारदारी में जुटे रहे, लेकिन मां हर वक्त मुझे ही आवाज देती थीं। मुझे एक पल भी आंखों से ओझल नहीं होने देती थीं। उनके साथ ऐसी बॉन्डिंग रही है कि अब भी मेरे कानों में उनकी वही आवाजें गूंजती हैं। उनके बुढ़ापे की लाठी तो मैं बनी, लेकिन इस लाठी को भी आगे बढऩे का बल तो मां केहाथों से ही मिलता था।

आज जिंदा हूं बेटियों के कारण

सुधा अरोड़ा, प्रख्यात रचनाकार

बेटियां बड़ी नियामत हैं। कई बार लिखा है मैंने। अपने तजुर्बे से, अपने आसपास के लोगों के अनुभवों से भी यही देखा और सीखा है। सबसे पहले अपनी बात दो बेटियां हैं मेरी। बेहद स्नेही, बेहद कोमल और बेहद जहीन। 15-20

साल मैं उन्हें फूलों की तरह सहेजती-संवारती रही, पर जैसे ही वे अपने पैरों पर खड़ी हुईं, उनका रोल रिवर्स हो गया। अब वे मेरी मां हैं और मैं उनकी बेटी।

कौन सी स्त्री ऐसी होगी जिसकी जिंदगी में कभी कोई तूफान न आया हो। मेरी जिंदगी में भी आते रहे। तूफान क्या, एक बवंडर तब आया जब मैं 60 पार कर चुकी थी। उसने ऐसी हलचल मचाई कि जीने की इच्छा ने दम तोड़ दिया, लेकिन दोनों बेटियां एक मजबूत स्तंभ की तरह मेरे दाएं-बाएं खड़ी हो गईं। उन दिनों की एक स्मृति- बड़ी बिटिया गरिमा एक मल्टीनेशनल कंपनी के रिसर्च सेंटर में बैंगलोर में जॉब कर रही थी। कुछ दिन छुट्टी लेकर मेरे पास रही। आखिर तो ड्यूटी पर लौटना ही था। बैंगलोर में वह हर सोमवार को अपना सामान लेकर नौकरी पर जाती और नौकरी के बाद शुक्रवार की ही रात मेरे पास फ्लाइट से मुंबई आ जाती। शनिवार और रविवार मेरे साथ, मेरे आसपास बनी रहती, सोमवार सुबह मुंबई से बैंगलोर की फ्लाइट लेकर सीधे एयरपोर्ट से अपने दफ्तर पहुंचती और वहां से शाम को अपने घर। ऐसा उसने महीनों किया जब तक मैं शारीरिक रूप से और मन से तंदुरुस्त न हो गई।

क्या कोई बेटा ऐसा करता? शायद नहीं। छोटी बिटिया अमेरिका में है, पर उससे सप्ताह में एक बार आधा-पौना घंटा से लेकर डेढ़ घंटे बात करना मेरे लिए किसी थेरेपिस्ट से मिलने जैसा है। वह मेरी एंटी डिप्रेसेंट औषधि है। मैं आज अगर जिंदा हूं, अपना काम कर रही हूं तो इसका श्रेय मेरी दोनों बेटियों को ही है।