भारत के इस प्रसिद्घ मं‌दिर में पुजारी ने किया ‘भगवान’ का आभास

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भारत के इस प्रसिद्घ मं‌दिर में पुजारी ने किया ‘भगवान’ का आभास

भले ही विज्ञान और तकनीकी के युग में लोग भगवान के अस्तित्व पर विश्वास न करें, लेकिन कभी-कभी ऐसी घटनाएं सामने आती हैं या सुनने को मिलती है। जिससे किसी महान शक्ति के होने का आभास होता है।

समय पर लोगों द्वारा किसी महान शक्ति के आभास होने की बात सामने आती है। भारत के प्रसिद्घ धाम के पुजारी बाधेश लिंग ने भी तीन साल पहले ऐसा ही कुछ महसूस किया था।

16-17 जून 2013 को केदारनाथ में चोराबरी ग्लेशियर से आए सैलाब ने केदारधाम को मरघट में बदल दिया था। मंदिर के पुजारी ने आपदा के वक्त साक्षात मंदिर में किसी महान शक्ति के होने का आभास किया। नेशनल फ्रंटीयर मैगजीन में छपे डॉ. ‌ब्रिजेश स‌ती के लेख में मंदिर के पुजारी बागेश लिंग ने इस बात का स्वीकारा है। पुजारी के मुताबिक आपदा के वक्‍त बागेश ने साक्षात ‌भगवान शिव के दर्शन किए।

16 जून की रात मंदिर के आसपास की धर्मशालाएं बहने के बावजूद रात डेढ़ बजे पुजारी बाधेश लिंग मंदिर में गए और भगवान केदार का ‌अभिषेक, पूजन और बालभोग लगाया, जिसके बाद वह सुबह साढ़े पांच बजे अपने आवास पर चले गए।

कुछ देर बाद अचानक पुजारी को अनहोनी का आभास हुआ। उन्होंने केदार बाबा की भोग मूर्ति को अपने पास लिया और केदारधाम की ओर चल दिए।

आठ बजे तेज आवाज हुई मंदिर हिलने लगा और मंदाकिनी नदी तेज बहाव के साथ मंदिर के पूर्वी दरवाजे से गर्भगृह में आ गई। इसके बाद मं‌दाकिनी ने गर्भगृह स्थित लिंग का अभिषक कर परिक्रमा की। इसके बाद सफेद रेत मंदिर के अंदर आ गई।

अचानक मंदिर का पश्चिमी द्वार खुला और मलबा वहां से ‌बाहर चला गया। यह दृश्य अद्भुत था। पुजारी ने बताया कि इतना मलबा आने के बाद भी गर्भगृह में पहुंचा मंदाकिनी का जल एक दम साफ था।

इसके बाद पानी के साथ आई रेत ने लिंग को समाधिस्त कर दिया था। फिर देखते ही देखते मंदिर में पानी का जल स्तर बढ़ता गया। पुजारी ने बताया कि पानी गले तक पहुंच गया, लेकिन वह केवल भगवान की भोगमूर्ति के बारे में सोच रहे थे।

उन्होंने बताया कि सुबह आठ बजे से शाम साढ़े चार बजे तक वह मलबे में दबे रहे। लेकिन बाबा केदारनाथ की परंपरा को खत्म होने नहीं दिया। और तीन दिन तक इधर-उधर भटक कर भोग मूर्ति को गुप्तकाशी के ओंकारेश्वर मंदिर पहुंचाया।

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मंदिर के पुजारी के पास भोगमूर्ति थी। (भोगमूर्ति अभिमंत्रित होती है और जब मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद होते हैं तो भगवान की उत्सव डोली के साथ इस मूर्ति के शीतकालीन पूजा के लिए ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में रखा जाता है।)